इस अवसर पर महानगर मंत्री मयंक पासवान ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन था, जब तत्कालीन सरकार ने संविधान को दरकिनार कर देश पर आपातकाल थोप दिया था। उन्होंने कहा कि यह मशाल जुलूस इस बात का प्रतीक है कि भारत का युवा वर्ग लोकतंत्र की हत्या जैसे किसी भी प्रयास का विरोध करता रहेगा और ऐसी घटनाओं से सबक लेना आवश्यक है।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य गरिमा त्रिवेदी ने कहा कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की आत्मा को कुचला गया। प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली गई, पत्रकारों की आवाज को दबा दिया गया, और हजारों नेताओं व विचारशील नागरिकों को जेलों में ठूंस दिया गया। उन्होंने कहा कि यह दिन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ एक अधिकार नहीं बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी है।
प्रांत मीडिया संयोजक दिनेश यादव ने कांग्रेस पार्टी की आलोचना करते हुए कहा कि आज भी आपातकाल जैसी क्रूर कार्रवाई के लिए कांग्रेस ने न तो देश से क्षमा मांगी है और न ही उस कृत्य पर खेद व्यक्त किया है। यह एक अत्यंत निंदनीय स्थिति है, जो दर्शाती है कि उस समय की तानाशाही मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया।
मौन प्रदर्शन और मशाल जुलूस के माध्यम से एबीवीपी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि भारत के नागरिक लोकतंत्र के महत्व को समझें और किसी भी स्थिति में उसे कुचले जाने की पुनरावृत्ति न होने दें।
इस अवसर पर प्रमुख रूप से प्रथमेश, उज्ज्वल, गजराज, सुधांशु, एल्विन, खुशी गुप्ता, विभाग संगठन मंत्री ज्ञानेंद्र सिंह, हर्ष राजपूत, ज्ञानेंद्र शुक्ल, उपेंद्र चक, राघवेन्द्र, गुंजन, रामजी, सुशांत मिश्रा, माधव राजपूत, ओम नारायण त्रिपाठी, हर्ष सिंह, नैतिक, प्रभात सहित दर्जनों कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
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